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Monday, 23 December 2013

डा. रघुनाथ मिश्र 'सहज' के तीन चुनिंदा मुक्तक :

डा. रघुनाथ मिश्र 'सहज' के तीन चुनिंदा मुक्तक :
                            एक :
बादलों   को  ओस   ने,  चहुँ  ओर  घेरा  है.
सूर्य की  किरणों  पे  उसका,  ख़ास  घेरा है.
है मेरी शुभ कामना,आनंदमय ये  दिन रहे,
हार जाए गम जो  बरवश, दिल में ठहरा है.
                         ०००
                           दो:
ओस  की   बूंदें  चमकतीं,   चिकने  पात  पर.
लोग  भिड़  जाते  हैं  अक्सर,  खोटी बात  पर.
लाख समझाने की  कोशिश, की गयी  सदियों,
कुछ मगर कायम हैं अब भी, ओछी  घात  पर.
                         ०००
                         तीन:
सूर्य   रश्मियों   का   स्पर्श   नहीं   आया,  घनघोर  कुहासा
पर  स्वागत है  अंतरतम से, यह क़ुदरत  का  खेल-तमासा
इसी  रूप में  यदि चिंतन की, आदत  में यदि आ  जाएँ  हम
छू न सकेगी हरगिज़ हमको, जीवकं भर कॊइ खीझ-हतासा
                                  ०००
           -डा.रघुनाथ मिश्र'सहज'



Sunday, 15 September 2013

Srijan....सृजन: डा.रघुनाथ मिश्र 'सहज' की चुनिंदा ग़ज़लें:

Srijan....सृजन: डा.रघुनाथ मिश्र 'सहज' की चुनिंदा ग़ज़लें:: डा.रघुनाथ मिश्र  'सहज' की चुनिंदा ग़ज़लें:             000 है भविष्य भी, वर्तमान का ही विस्तारित. कल होता है, सिर्फ आज से ही न...

डा.रघुनाथ मिश्र 'सहज' की चुनिंदा ग़ज़लें:

डा.रघुनाथ मिश्र  'सहज' की चुनिंदा ग़ज़लें:
            000
है भविष्य भी, वर्तमान का ही विस्तारित.
कल होता है, सिर्फ आज से ही निर्धारित.
अपमानित  चेक - वचन पत्र  - सिक्के,
तीनों  में, सिक्के  चुनना ही,  सर्वोचित.
भोजन - पानी - हवा जरूरी  माना  पर,
बहुत जरूरी है,  ए  सब हों,   बेलाक्षित.
दिल  है  अगर  साफ,  मत हो  बेकल,
चाहे जितनी जगह,  हुआ  तू  आरोपित.
क़ुदरत की है भेंट,  सभी  को ए धरती,
मत बोझिल हो, कहीं नहीं तू विस्थापित.
निर्णित जो  पहले,  पूरा कर ले  पहले,
छोड़ अभी का,आगे का मत कर निस्तारित.
             000
हर्ज़ नहीं है, करें  कमाई, जोड़ें - भोगें धन.
रहे मगर ए पाक-साफ,सुथरा-उजला जीवन.
श्रम  की कीमत  क्या है,  समझ जरूरी है.
बिना किये खाया-पीया, है झुलसाता तन-मन.
चोरी - छीनाझपटी - हेराफेरी-धोखाधड़ी सभी,
चुक जाते  हैं,  बाकी  रह जाता है, रीतापन.
दिल  व्यापक और  सोच  संकुचित, बेमानी,
बीते काले दिन की  यादें, छोड़ मिटे उलझन.
जैसे कर्म-विचार। छाप  है वही आत्मा  पर,
सच्चाई के लिये  देख, अपना ही दिल दर्पन.
सीमित किया हुआ है खुद को, जाति-धर्म से,
तोड़  सरहदें - हदें   सभी,  तो  बने  गगन.
             000
झरने - जंगल - नदी, यहाँ भी और वहाँ भी,
सौ वर्षों  की शदी , यहाँ  भी और वहां  भी.
रहो  अकेले,  बंद   रहें,  खिड़की - दरवाजे,
तुम्हें भला क्या पड़ी, यहाँ भी और वहां  भी.
शर्म-ओ- हया हटी, अस्मत  की खाक  उड़ी,
विवश आंख है मुदी, यहाँ भी और वहां  भी.
सबकी लाचारी - बदहाली - मुश्किल -उसकी.
होती  है  गुदगुदी,  यहाँ भी और वहां  भी.
सुरा -सुंदरी -ऐश खूब, तो पाप-पुन्य  क्या,
क्या है नेकी -बदी ,  यहाँ भी और वहां  भी.
उनका जीवन कटा, हवा  का एक झोंका सा,
मिरी जिंदगी  लदी, यहाँ भी और वहां  भी.
               000
बेटा  बीमार   है.
महंगा  उपचार है.
जिंदगी पहाड़  सी,
बोझिल  परिवार है.
सपना  सुखों   का,
हुआ  त र-तार  है.
सूझती  डगर  नहीं,
घना  अंधकार   है.
जियें तो जियें कैसे,
सांस भी  उधार  हैं.
कामगार  है  भूखा,
थोड़ी   पगार   है.
जवानी  है  घायल,
बचपन  लाचार  है.
जीवन  संग्राम  में,
भारी   संहार   है.
बाप  ने औसाद में,
छोड़ा   संसार   है.
     000
 -डा.रघुनाथ मिश्र  'सहज'

Monday, 26 August 2013

'कौशिकी' त्रैमासिक साहित्यिक पत्रिका - Apni Maati: News Portal

'कौशिकी' त्रैमासिक साहित्यिक पत्रिका - Apni Maati: News Portal
आदरणीय कैलाश झा .किंकर' साहिब. आप ने बहुत सुब्दर ब्लॉग बनाया है.बधाई.
सादर,
सहज 

'कौशिकी' त्रैमासिक साहित्यिक पत्रिका - Apni Maati: News Portal

'कौशिकी' त्रैमासिक साहित्यिक पत्रिका - Apni Maati: News Portal
आदरणीय कैलाश झा .किंकर' साहिब. आप ने बहुत सुब्दर ब्लॉग बनाया है.बधाई.
सादर,
सहज

'कौशिकी' त्रैमासिक साहित्यिक पत्रिका - Apni Maati: News Portal

'कौशिकी' त्रैमासिक साहित्यिक पत्रिका - Apni Maati: News Portal
आदरणीय कैलाश झा .किंकर' साहिब. आप ने बहुत सुब्दर ब्लॉग बनाया है.बधाई.
सादर,
सहज

Friday, 16 August 2013

                    फेसबुक और मैं.

दोस्तों ! या तो मेरे ऑपरेट करने के तरीके में कोई कमी है या कोइ साज़िश मेरे खिलाफ़ चल रही है, जिसे मैं समझ नहीं पा रहा हूँ. फेसबुक मैंने ५ वर्ष पूर्व बनाया था, जो 16 जून' 13 तक सफलता पूर्वक चला. अचानक १७ जून'१३ को जब लोग इन किया तो लिखा हुआ आया " YOUR ACCOUNT HAS BEN TEMPORARILY SUSPENDED". फेसबुक ने आइडेन्टिटी वेरीफाई कराई .जो तकनीकी जानकारी कम होने से सफलता नहीं मिली. तदुपरांत एक के बाद एक -5 ऍफ़.बी. आई.डी. और बनाई औए धीरे -धीरे सभी बंद होती गयीं . आज अभी जब फेसबुक पर आया और लोग इन किया तो फिर वही - FB का रटा- रटाया फिर वाक्य दोहराया गया-PLEASE VERIFY YOUR IDENTITY. अंततः  मैं अब इस निष्कर्ष पर पहुंचा की लोग- मेरे ही कुछ अपने-ऍफ़.बी. टीम या अज्ञात कारणों से अब मैं ऍफ़.बी. नहीं चला पाउँगा. अतः भरी मन से ऍफ़.बी. को अलविदा कह रहा हूँ और मुझसे जुड़े सभी मित्रों-हमदर्दों-सहयोगियों का ह्रदय से आभारी हूँ, जिन्हों ने मुझे सराहा-प्रोत्साहित किया और हर क़दम पर मेरे साथ रहे.
फेसबुक से अलविदा कहते हुए आप सभी गूगल+ से जुड़े मित्रों से विनम्र अनुरोध है की वे अब मुझे नेरे ब्लॉग सृजन raghunathmisra.blogspot.in पर मिला करें और पढ़ा-पढाया करें और साथ ही अपने बहुमूल्य सुझावों/ प्रतिक्रियावों  से प्रोत्साहित किया करें.
साभिवादन-सादर-सप्रेम,
-डा. रघुनाथ मिश्र 'सहज'

ghazal

करनी और कथनी में अंतर.
जीवन में चल रहा निरंतर.
काम नहीं तो दाम नहीं फिर,
कुछ न करेंगे जादू –मंतर.
कदमताल कर यूँ ही नाहक,
क्यूँ कर डाला नष्ट मुक़द्दर.
लड़ने चला जगत से पागल,
दुश्मन बैठा खुद के अन्दर.
करता रहा शिकायत सबकी,
झांक न पाया खुद के भीतर.
होगी जिसकी सोच सार्थक,
होगा वह ही मस्त कलंदर.
कर ले यदि छुट्टी नफ़रत से,
प्यार आएगा फाड़ के छप्पर.
मीत बना ले दिल को अपने,
बन जायेगा जीवन बेहतर.
लक्ष्य बने सर्वोच्च तभी ही,

कम से कम मिल सके उच्चतर.
-डा. रघुनाथ मिश्र 'सहज'

DR.RAGHUNATH MMISHRA 'SAHAJ' KI GHAZAL.

ग़ज़ल:
आज़ाद है वतन सही, आज़ाद हम नहीं.
खाई गरीब अमीर की, अब भी ख़तम नहीं.
हमने संजोये थे कभी, खुशहालियों के ख्वाब,
आँखों में बाढ़ आज भी, अश्कों की कम नहीं.
रोटी की मांग पर हमें, हैं जेल- गोलियां,
चूल्हे भुझे पड़े थे जो, अब भी, गरम नहीं.
है देश आज भी उन्हीं, गुंडों के हाथ में,
खायेंगे बेच मुल्क वे, बीतेंगे ग़म नहीं.
निचुड़े हुए खू पर खड़े, शाही महल यहाँ,
लाशों के रोज़गार के, अड्डे हैं कम नहीं.
बुनियाद में भरी हुई है, रेत बेशुमार,
दिवार हिल रही है अब, मकाँ में दम नहीं.
दम तोड़तीं जवानियाँ, अरमां लिए हुए,
बाकि रहा उनके लिए, कोई सितम नहीं.
-डा.रघुनाथ मिश्र ‘सहज’
(मेरी पुस्तक 'सोच ले तू किधर जा रहा है'- (हिंदी-उर्दू ग़ज़ल संग्रह ) से.)

Tuesday, 13 August 2013

हाइकू :
1.
मैं जानता हूँ
कितने दिन बाकी
चूका देता हूँ

२.
घबरा नहीं
संभलेगा यदि है
प्रयत्न सही

3

नहीं डरावो
संभालो खुद तुम
राह पे आवो
-डा. रघुनाथ मिश्र 'सहज'

Saturday, 10 August 2013

आज़ादी हर कीमत पर, साँसें-धड़कन है हिन्दुस्तन। 
दुश्मन की बदनीयती हरगिज़, नहीं चले, देदेंगे जान। 
पाल-पोश दे ना ज़ रखा है, हमने अब तक हरा चमन,
नहीं चलेगी किसी सख्श की, चीन आये या पाकिस्तान।
- डा. रघुनाथ मिश्र 'सहज'

Saturday, 27 July 2013

दोहे

रुक-रुक  कर  आने लगी,    है   फिर से  बरसात.
रिमझिम -रिमझिम की झड़ी ,भीग रहा मन-गात.

कृषकों     में     आल्हाद    है ,  लहरायेंगे    खेत.
आएगा   सब  लौट  अब , बिगाड़ा  ब्याज  समेत 

महंगाई    की   मार  से, जीवन    हुआ      तबाह.
झड़ी  लगी  बरसात  की,   अब  होगी  फिर   वाह.

आसमान   से  अनवरत,   बरस    रही  है  आस. 
अब    अंधियारा    फाड़ कर, आई   ज्यूँ उजियास.

अभिनन्दन     बारिश   तेरा,  करती  धरती आज.
जलसा      सा    माहौल है, है खुशियों    का साज.
_डा. रघुनाथ मिश्र 'सहज'

चुनिन्दा मुक्तक

बैर  कुदर त  से,  कभी  चलता   नहीं.
बिन किये खाया, सदा   पचता   नहीं.
आदमी ने लाख  कोशिश   कर  लिए,
कर्म   बिन  इतिहास  है बनता  नहीं.
                 000
कर्म  बिना  कुछ  दे   न  सके   भगवान.
बिना  बने  कुछ   काम   न  आये  ज्ञान.
प्यार नहीं जिसमें गरीब वो सख्स बड़ा,
है जिसमें  भाई-चारा  वह  ही  धनवान.
                  000
जिंदगी बस जिंदगी है.
वो  खुद  ही  बंद गी  है.
बचना  है किसी से  तो,
वो  सिर्फ  गन्दगी    है.
              000
-डा.रघुनाथ मिश्र 'सहज'

दोहा

दोहा:
यश-अपयश को भूल जा, कर जीवन साकार.

खुदगर्जी को त्याग कर,  ही मिलता  आधार.
डा.रघुनाथ मिश्र 'सहज'

Monday, 22 July 2013

gazalen

डा. रघुनाथ मिश्र  की दो गज़लें 
               000
देखा  कुदरत का ऐसा कहर ना  कभी. 
देखा  गुस्से  का  ऐसा असर ना  कभी. 

यूँ   तो  आना  व  जाना चला  ही  करे . 
देखा  होना  यूँ अंतिम  सफ़र ना कभी . 

मार डाले  न  छोड़े  किसी  भी   तरह.  
देखी  लहरों  में  ऐसी  लहर ना  कभी . 

लेखनी  लिख ग़ज़ल-गीत   ऐसे सदा . 
हों   मुखर भाव टूटे  बहर  ना   कभी . 

कुछ   करें   अब  असरदार यारो उठो . 
बद्विचारों  का  लिले  ज़हर  ना  कभी . 

हो 'सहज' ज़िन्दगी जी लें जीभर सभी . 
तू   बुराई  पे    हरगिज़ ठहर ना   कभी .  
                          000

सुनता   नहीं   कोई  है   बात क्या  कीजै . 
दुश्मन   लगा   रहा  है  घात क्या   कीजै . 

किसलय के पास आ रहा बसंत यकीनन . 
डाली   पे  पक  चुके  जो पात क्या   कीजै . 

चंद  मर  गए  अजीर्ण   से  है  समाचार में . 
गावों  में   भूख पर  उत्पात     क्या   कीजै . 

चुनाव आ गए हैं  सर पे  इस लिए  शायद . 
उठा   लिया   है अब  आपात  क्या  कीजै . 

कुदरत से थी तनातनी सदियों से चल रही . 
यकबयक        ये   बज्रपात   क्या      कीजै . 

वो  था  अतीत  लौट  कर  न आयेगा  कभी . 
आज  के  हैं  हाथ  में   हालात   क्या  कीजै . 
                             000
डा . रघुनाथ मिश्र 'सहज'



दो छणिकाएं

दो छणिकाएं


आंसू 
पी गया हूँ 
मतलब 
गम खा गया हूँ 
ख़ुशी 
महफूज़  रहे कैसे 
वही करना /वैसे ही रहना 
सीख गया  हूँ 
        ००० 

प्यार 
 दिल में होता है 
अन्दर है तो 
पवित्र/ असली/ सर्वाधिक शक्तिशाली 
इज़हार  ज़रूरी  नहीं 
आँखों में दिख जाय 
बिना संवाद  समझ में आ जाय 
वही है 
नि:स्वार्थ/ असली/ निश्छल 
प्यार 
                     ००० 
डा. रघुनाथ मिश्र  'सहज'

Sunday, 21 July 2013

DR.RAGHUNATH MISRA 'SAHAJ' KE MUKTAK

ड. रघुनाथ मिश्र  'सहज'  के
बहती हुई गंगा है, नहा लो, कुलांच लो. 
माकूल ये समय है, निरीहोँ को फाँस लो. 
अवसर असर  बनाने का फिर आये न आये, 
ऐसे मेँ किसकी जान, काम की है जाँच लो. 
00000 
सर से बँधा हुआ कफन, जल्दी उतर गया.
मरने तलक् निर्भीक वह,इक पल मेँ डर् गया. 
द्रिढता बडी दिखी थी,भाशणोँ मेँ आग थी. 
उम्मीद के प्रतिकूल, क़द वो छोटा कर गया. 
00000
ढाई आखर, वेद - पुराण सिखा जाते हैँ.
जीवन के सारे रहस्य, खुलवा जाते हैँ.
प्रेम नहीँ तो जग- जीवन रीता-रेता सा,
ढाई आखर सुखद भविश्य दिखा जाते हैँ.
00000
चेहरे के पीछे इक है, अंजान् सा चेहरा.
दिखता बडा सुन्दर, लगे गूंगा, जंचे बहरा.
खामोश हो जब चल पडे, अग्यात मक़सद पर,
मंजिल के नाम पर मिला, क़ातिल वहाँ ठहरा
00000
( साहित्यकार-5 मेँ छपे मेरे मुक्तकोँ मेँ से

-दा. रघुनाथ मिश्र 'सहज'

Wednesday, 17 July 2013

डा. रघुनाथ मिश्र 'सहज' के मुक्तक

डा. रघुनाथ मिश्र 'सहज' के मुक्तक :

                    (१)
बूजुर्ग    छाया   देते  हैं  पेड़  की  तरह
विचलन   रोकते हैं   वे  मेड की  तरह
मिल  गया   जिसे  भी  आशीष  उनका
मस्त   रहते  हैं  वे  अखिलेश  की तरह
                 (२)
हो  आप का जीवन भरा, खुशियों से हर इक पल
हंसते    व  झूमते      हुए  जाए    उमर   निकल
नफरत   है  ज़हर  ज़िन्दगी  में  मान   लीजिये
बस प्यार  ही  में,  प्यार से ही,   है जगत  सकल

                  (३)
जीना    हजार      साल   किसी  काम  का   नहीं
करोणो    का   हो सामान  किसी  कम  का  नहीं
है    प्यार   जिसके   पास  वो  बड़ा   अमीर     है
साधाव बिन  पद- नाम    किसी  काम  का  नहीं
-डा. रघुनाथ मिश्र 'सहज'

CHHANIKA

डा .रघुनाथ मिश्र  'सहज' की छणिका 
ज़िन्दगी राई है/ सकारात्मक सोच है अगर
पढा/ सुना/ एहसास किया है/ अनेकोँ ने
पसीना आता है लेकिन
लागू करने मेँ
नकारात्मक हो/ आलस्यवश/ आराम तलब हो जाने से
यही ज़िन्दगी पहाड बन जती है.
- डा. रघुनाथ मिश्र 'सहज'


ko




Wednesday, 10 July 2013

GHAZAL

देखा कुदरत का ऐसा कहर ना  कभी।
देखा गुस्से का ऐसा असर ना   कभी।  

यूँ  तो  आना  व  जाना  चला  ही  करे,
देखा होना यूँ  अंतिम सफ़र  ना कभी।

मार  डाले  न  छोड़े  किसी   भी  तरह,
देखी लहरों  में  ऐसी  लहर ना   कभी।

लेखनी  लिख   ग़ज़ल-गीत ऐसे  सदा,
हों   मुखर भाव  टूटे  बहर  ना  कभी।

कुछ  करें अब  असरदार  यारो  उठो,
बद्विचारों  को  लीले  ज़हर ना  कभी।

हों  'सहज'  जिंदगी जी लें जी भर सभी,
तू  बुराई  पे  हरगिज   ठहर  ना   कभी।   
-डा . रघुनाथ मिश्र 'सहज' 


Tuesday, 9 July 2013

DR.RAGHUNATH MISRA 'SAHAJ' KI GHAZALEN

अक्ल       बिकती   नहीं  बाज़ार  में।
ज्ञान   मिलाता  नहीं   उपहार     में।

प्यार  दिल में   नहीं असली   अगर,
ह्रदय स्वीकारता नहीं   इज़हार  में।

मस्तिष्क से संभव नहीं जो हो सका,
ह्रदय   से    हो    गया    संसार      में।

भोर      घायल  दिखे     ख़बरों  में   है,
दिखें      बस      नफरतें    अख़बार में।

बनाने         की  मसक्कत  है  कठिन,
मज़े        पर       लो  न    बँटाढार   में।

कौन     कहता  है   चला   करता  नहीं,
सद्विचारों        का      असर  व्यापर में।
                       (२)

क्षमता    बड़ी      खाकर     पचाने    की।
श्रद्धा        नहीं               चोरी   बताने की।

लगा          दें      आप   पूरी  उम्र  सेवा में,
आदत        मिरी       न  कुछ  गंवाने   की।

बनाये      या     बिगाड़े       देश           कोई,
मिरी          मंसा          मुझे        बनाने  की।

अनेको      मर       मिटे          आवाम    पर,
मिरी         आदत       महज़     जन्चाने  की।

 नाचते        होंगे   उँगलियों         पर        कई ,
 मिरी         फितरत          रही       नाचने  की।

जिंदगी      भर         के    करम     हैं     सामने,
अक्ल        पर          आई      नहीं  पछताने की।

जा             रहीं        साँसें  जंचाकर      अंत   में,
है        घडी         पापों    की  सजा     पाने    की।
-डा.  रघुनाथ मिश्र 'सहज'

फेसबुक मैत्री सम्मलेन 29-30 सितम्बर 2012......सफल रहा ...:)


फेसबुक मैत्री सम्मलेन 29-30 सितम्बर 2012
पूनम की नज़र से 

आयोजक: ‘हम सब साथ साथ’ और ‘अपना घर’ 
स्थान : ‘अपना घर’ भरतपुर ,राजस्थान ,भारत
विशेष योगदान:किशोर श्रीवास्तव ,अशोक खत्री 

अपना घर,भरतपुर 



लगभग एक माह से फेसबुक पर इस आयोजन के होने की सूचना और इससे सम्बंधित गतिविधियों की गूँज हो रही थी जिसकी प्रतिध्वनि भारत के विभिन्न प्रान्तों से सुनी जा सकती थी|दिल्ली से ‘हम सब साथ साथ हैं पत्रिका के संपादक किशोर श्रीवास्तव एवं श्रीमती शशि श्रीवास्तव जी और बयाना से श्री अशोक खत्री जी के मार्गदर्शन में इस प्रोग्राम का आयोजन संभव हुआ|

मै और नरेश गोकुलधाम के दर्शन के बाद 


29 सितम्बर ........

मै(पूनम) और नरेश माटिया 29 सितम्बर कोमथुरा में गोकुल धाम के दर्शन कर भरतपुरलगभग दोपहर 4.30 बजे पहुंचे|  
अपना घर प्राकृतिक सौंदर्य के मध्य 


29 सितम्बर की सुबह से कई फेसबुक मित्रगण वहाँ आने शुरू हो गये थे जिनमे सबसे पहले पहुँचने वाले थे उज्जैन से संदीप सृजन( ‘शब्द प्रवाह’ के संपादक) और उनके बाद लेखक /कवि डाक्टर ए.कीर्तिवर्धन (मुज़फ्फरनगर), प्रसिद्द व्यंग्यकार सुभाष चन्द्र (दिल्ली ),गज़लकार ओमप्रकाश यति (नॉएडा ), डाक्टर सुधाकर आशावादी ,कवि अतुल जैन सुराना और गाफ़िल स्वामी (अलीगढ ) भी ‘अपना घर’ पहुंचे |..दिल्ली से आने वाले मित्रों में किशोर श्रीवास्तव ,शशि श्रीवास्तव के साथ संगीता शर्मा (बच्चों सहित ),ऋचा मिश्रा (दैनिक जागरण,नॉएडा ) पूनम तुशामड , सुषमा भंडारी और मानव मेहता (हरियाणा से) आये| झाँसी से नवीन शुक्ला जी और भीलवाडा, भरतपुर, बाड़मेर तथा फतहपुर सीकरी से भी कई मित्र इसमें रात तक शामिल हो गये थे| 
विशाल भवन बेसहारों का सहारा 

 पीड़ित लड़कियों से बात करते हुए 
अपना घर के लोगों से मिलने को आतुर 
‘अपना घर ‘ से जुड़े हुएअशोक खत्री जीऔर अपना घर के संस्थापक डाक्टर दम्पति माधुरी जी एवं बी ऍम भारद्वाज जी के सफल निर्देशन में सभी आमंत्रित मेहमानों के रहने ,खाने पीने का बंदोबस्त किया गया था |5 बजे पंजीकरण और परिचय सत्र में सबने अपना-२ परिचय दे कर दो -दिवसीय आयोजन की शुरुआत की|चाय पीकर सभी ‘अपना घर’ संस्था के भ्रमण के लिए अशोक खत्री जी के साथ निकले जहाँ जिंदगी के वीभत्स किन्तु मार्मिक रूप से रु-ब-रु हुए| बातचीत के दौरान मानसिक रूप से परेशान बालिकाओं ,महिलाओं और वृद्धो से उनके हालात के बारे में पता चला कि कैसे जिंदगी ने और उनके अपनों ने ही उन्हें छला था | ‘अपना घर’ संस्था इन अजनबी, अनजान, मुसीबतों से ग्रस्त हर आयु के लोगो को रहने, खाने-पीने और उपचार तथा व्यवसाय की सुविधायें प्रदान कर सामाजिक कार्यों में बेहतरीन योगदान कर रही है| दिल्ली से आये प्रख्यात पत्रकार एवं कवि श्री सुरेश नीरव जी के शब्दों में‘अपना घर’ आना एक तीर्थ यात्रा के समान है | 

अपना घर भ्रमण के बाद एक विचार गोष्ठी आयोजित की गयी जिसका विषय था“मैत्री भाईचारे के प्रचार प्रसार व साहित्यिक , सामाजिक एवं सांस्कृतिक सन्दर्भ में फेसबुक की उपयोगिता”| उदघोषणा किशोर श्रीवास्तव जी ने की और श्री सुभाष चन्द्र जी की अध्यक्षता में लगभग सभी सदस्यों ने ( सर्वश्री कीर्तिवर्धन , पूनम तुशामड , सुधाकर आशावादी , शशि श्रीवास्तव ,गाफिल स्वामी , सुषमा भंडारी , ऋचा मिश्रा , अशोक खत्री , पूनम माटिया और रघुनाथ मिश्र जी ने अपने विचार रखे और सबने लगभग यही बात कही कि फेसबुक एक उपयोगी माध्यम साबित हो रहा है इस सन्दर्भ में | अपने अध्यक्षीय वक्तव्य में सुभाष जी ने कहा ‘फेसबुक तब अपनी बुलंदियों को पाता है जब उस से सरोकार जुड़े’ | अतुल जैन सुराना ने धन्यवाद ज्ञापन दिया |

विचार गोष्ठी 
रात्रि भोज के बाद गीत संगीत की महफ़िलजमी जिसमे किशोर जी ने ढोलक की थाप पर भजन और गीत प्रस्तुत किये तथा मिमिक्री से सबका मन मोह लिया |नवीन शुक्ला जी ने अपने मीठी बांसुरी की तान से सबको मंत्रमुग्ध कर दिया | पूनम तुशामड , संगीता शर्मा , सुषमा भंडारी सभी ने अपने-२ स्टाइल में गीत सुनाये | सुभाष चन्द्र , ऋचा मिश्रा और कई मित्रों ने गज़ल सुनाकर महफ़िल में समा बाँधा |गाफ़िल जी ने माँ को समर्पित अपनी रचना बड़े जोर शोर से सुनाई | ढोलक की थाप ,ढपली और मजीरे की झंकार के साथ एक लोक गीत पर पूनम माटिया यानि मैने नृत्य भी किया |

30 सितम्बर 

कचोडी-आलू, जलेबी और पोहे के नाश्ते के साथ सबने किशोर श्रीवास्तव कृत“खरी-खरी” कार्टून प्रदर्शनी का भी लुत्फ़ उठाया | उस समय तक कई और फेसबुक मित्र भरतपुर पधार चुके थे जिनमे पुरुस्कृत अरविन्द ‘पथिक’, हेमलता वशिष्ठ, कृष्ण कान्त मधुर, पूनम त्यागी (दिल्ली)और अजय अज्ञात (फरीदाबाद) दिल्ली से प्रमुख हैं | प्रख्यात कवि सुरेश नीरव जी , प्रसिद्द गज़लकार साज़ देहलवी , डॉ रेखा व्यास (दिल्ली दूरदर्शन) , कवि रघुनाथ मिश्र (राजस्थान) इस आयोजन में शामिल हुए |

फतेहपुर सीकरी पर समूह तस्वीर 
सलीम चिश्ती की दरगाह 
‘अपना घर’ की ओर से आयोजितफतेहपुर सिकरी भ्रमण का लाभ 25-30 लोगो ने उठाया और तेज धूप के बावजूद सभी ने सलीम चिश्ती दरगाह और बुलंद दरवाजे का अवलोकन किया साथ ही खूब खरीदारी भी की |

नये मित्रों के साथ 
दरगाह की पौड़ी पर 

दोपहर के भोजन के उपरांतकवि सम्मलेन आयोजित किया गया जिसकासञ्चालन किशोर श्रीवास्तव और अरविन्द ‘पथिक’ ने किया |इस कवि सम्मलेन कीअध्क्षता श्री सुरेश नीरव जी ने की और मंच पर उनका साथ दिया गज़लकार साज़ देहलवी जी, रघुनाथ मिश्र जी और डॉ रेखा व्यास जी तथा भारद्वाज जी और माँ माधुरी जी ने | इन महान विभूतियों के कर-कमलों द्वारा ‘हम साथ-साथ है’ पत्रिका द्वारा आयोजित मैत्री सम्मान श्री सुरेश नीरव जी को और श्रीमती पूनम माटिया को दिया गया | उसके उपरान्त विभिन्न कवियों ने अपनी कविताओं का पाठ किया जिसको श्रोतायो ने बड़े मन लगाकर सुना और समय-२ तालियों से उनका हौसला वर्धन किया | इस दौरान सुषमा भंडारी जी का काव्य संग्रह ‘अक्सर ऐसा भी’ का विमोचन भी किया |

श्रेष्ठ जनों द्वारा पुरुस्कृत होते हुए मै 
श्री सुरेश' नीरव' जी ,श्री रघुनाथ मिश्र जी एवं हम साथ साथ हैं की संपादक श्रीमति शशि श्रीवास्तव 
कविता पाठ और ग़ज़ल गायकी का क्रम मुझसे यानि पूनम माटिया से आरंभ हुआ और उसके बाद संदीप सृजन , अतुल जय सुराना ,दीक्षित जी, अजय ‘अज्ञात’ ,पूनम तुशामद ,सुषमा भंडारी, संगीता शर्मा, ऋचा मिश्रा ,किशोर श्रीवास्तव , कृष्ण कान्त मधुर , ओम प्रकाश यति, गाफ़िल स्वामी, अशोक खत्री जी और अरविन्द ‘पथिक’ जी की  जोश से भरी गायकी तक चला | अंत में रघुनाथ मिश्र जी और साज़ देहलवी जी , रेखा व्यास जी और श्री सुरेश ‘नीरव’ जी ने अपनी भावनात्मक गज़लों से सबका मन मोह लिया | किशोर श्रीवास्तव जी ने धन्यवाद ज्ञापन देकर इस आयोजन की समाप्ति की घोषणा की |

मुझसे फिर जल्दी आने की कहते हुए :)
कार्यक्रम के अंत में ‘अपना घर’ के संस्थापक डॉ भारद्वाज दंपत्ति ने प्रतीक चिन्ह देकर आये हुए सभी मित्रों को सम्मानित किया |

विदा के पल ‘अपना घर’ के वासियों के लिए और हमारे लिए काफी भावुक थे उनकी निगा

Sunday, 26 May 2013

ताज़ा गज़ल्


बिछडे, हुए, ,मिलेँ, तो, गज़ल, होती, है.
खुशियोँ, के गुल खिलेँ, त गज़ल होती है.

वर्शोँ से हैँ, आलस्य के, नशे मेँ हम सभी,
पल, भर अगर हिलेँ तो गज़ल होती है.

होश मेँ आयेँ, अभी ,भी कुछ नहीँ बिगडा,
अब से सही चलेँ, तो गज़ल हो ती है.

जँगल- नदी- पहाड- डगर की रुकावटेँ,
ये हाथ गर मलेँ तो गज़ल होती है.

आसान नहीँ है, ये ज़िन्दगी बडी कठिन
,
हालात मेँ ढलेँ, तो गज़ल होती है.

अंतर है आदमी मेँ -जानवर मेँ इक बडा,
इंसाँ के रूप मेँ न हम, खलेँ तो गज़ल होती है.
- डा. रघुनाथ मिश्र

Monday, 20 May 2013

40 साल पुरानी गज़ल के चन्द शेर्

40 साल पुरानी गज़ल के चन्द शेर:

देश का जिसमेँ, सम्मान् हरगिज़ नही.
उसका अपना कोई मान, हरगिज़ नहीँ. 

मान- सम्मान, महफूज़ रखना सदा,
आज कल कोई, आसान हरगिज़ नहीँ.

देश रक्षा मेँ चाहे, ज़लालत सहेँ,
गर्व है इसमेँ, अपमान हरगिज़ नहीँ.
डा. रघुनाथ मिश्र
( मेरी पुस्तक- हिन्दी अंग्रेजी गज़ल संग्रह, 'सोच ले तू किधर जा रहा है' से

Sunday, 19 May 2013

एक बिल्कुल ताज़ा गज़ल्

गज़ल
000
क्या बनना है अगर आ गया, फिर चिंता की बात नहीँ.
परमारथ का भाव भा गया, फिर चिंता की बात नहीँ.

सोया पडा ज़माना सारा, कौन जगाये- प्रश्न ज्वलंत,
प्रश्न अगर सर्वत्र छा गया, फिर चिंता की बात नहीँ.

बनने की खातिर इक्ज़ुट हैँ, आपस मेँ सब ह्रिदय अगर,
तब बिगाड आंखेँ दिखा गया, फिर चिंता की बात नहीँ.

सुपरिणाम पाने के लायक, कर्म तहे दिल से कर डाला,
प्रतिफल फिर गहरा सता गया, फिर चिंता की बात नहीँ.

गीत खुशी के मचल रहे हैँ, बस अधरोँ तक आने को,
राज़ कोई गर ये बता गया, फिर चिंता की बात नहीँ.

है बस्ती खुश, हर बगिया मेँ,पुश्प-पत्र- फल सभी कुशल हैँ,
अंट-शंट सिरफिरा गा गया, फिर चिंता की बात्त नहीँ.
- डा. रघुनाथ मिश्र
09214313946

Friday, 17 May 2013

एक पुरानी गज़ल्



दोस्तो, एक पुरानी गज़ल, मेरी पुस्तक, 'सोच ले तू किधर जा रा है' ( हिन्दी- उर्दू गज़ल संग्रह) से आप को साझा कर रहा हूँ. आप की प्रतिक्रिया मुझे सम्बल देगी- मैन उसका तहे दिल से इंतज़ार करूँगा.(आप मेरे ब्लोग: raghunathmisra.blogspot.in) पर भी पधारा करेँ और मेरी रचनायेँ पध कर मुझ नौसुइक्जिये ब्लोगर का उत्साहवर्धन करने महती क्रिपा किया करेँ और उसे विकसित करने और जनोपयोगी बनाने मेँ अपने महत्वपूर्ण सुझावोँ से अमूल्य योगदान देँ)

गज़ल:

किसने लगायी आग और किस- किस का घर् जला.
मेरे शहर के अम्न पे कैसा क़हर चला.

क्या माज़रा है दोस्त, चलो हम पता करेँ,
इस बेक़सूर परिन्दे का, कैसे पर जला.

कुछ भेडिये गमगीन हैँ, इस खास प्रश्न पर,
कैसे खुलुस- ओ -प्यार मेँ, अब तक शहर पला.

किसकी ये साज़िशेँ हैँ, हिमाक़त ये कौन की,
विश घोल फज़ाओँ मेँ, चुरा जो नज़र चला.

कल शाम् हुए हादशोँ पे, हो चुकी बहस्.
है प्रश्न इसी दौ र का, आखिर किधर भला.
- रघुनाथ मिश्र्


Thursday, 16 May 2013

माँ पर एक मुक्तक्

"माँ की ममता. 
नहीँ इसकी समता. 
जग मेँ कहीँ भी, 
नहीँ यह तरलता".
- डा. रघुनाथ मिश्र्

गज़ल: सोच ले तू किधर जा रहा है


सोच ले तू किधर जा रहा है:
        000
सोच ले तू किधर ज रहा है.
एक अज़ूबी ड्गर जा रहा है.
किसका जादू हुआ है युँ हावी,
तुझको मीठा ज़हर भा रहा है.
होता फौलाद है आदमी फिर,
रेत सा क्योँ बिखर जा रहा है.
तोड सक्ता है पत्थर जो सिर से,
हाँफता क्योँ नज़र आ रहा है.
नफरतोँ के ज़हर घोल दिल मेँ,
प्रेम पर क्योँ क़हर ढा रहा है.
ज़िंस की भांति बिकने की धुन मेँ,
तुझमेँ  कैसा न असर अ रहा है.
बस बना झुंझुना दूसरोँ का.
बेवज़ह जी के मर जा रहा है.
        000
  - डा. रघुनाथ मिश्र
(मेरी पुस्तक, 'सोच ले तू किधर जा रहा है' - हिन्दी- उर्दू गज़ल संग्रह से)

             

            

गज़ल: है असली सुन्दरता भीतर्


                ग़ज़ल
है असली सुंदरता भीतर.
कर पैदा तत्परता भीतर.

कुदरत की रचना बहुरंगी,
हो तुझमें समरसता भीतर.

कुछ भी बना-न बन पायेगा,
कायम यदि बर्वरता भीतर.

इधर-उधर है जिसे ढूढता,
जग का पालनकर्ता भीतर.

कर विश्वाश मिलेगा समुचित,
अर्जित कर ले दृढ़ता  भीतर.

बाहर तों  लेना-देना बस,
इन्सां जीता-मरता भीतर.

क्या देगी यात्रा बाहर की,
अंतर्मुखी सफलता भीतर.

जीवन मरुथल पाजाये मधु,
खुद में भरे मधुरता भीतर.

पूरी उम्र खुशी की खातिर,
भटका बाहर-तड़पा भीतर.
        000
  - डा. रघुनाथ मिश्र्

      
 

Tuesday, 14 May 2013

रघुनाथ मिश्र की पुरानी चुनिन्दा गज़लेँ



डा. रघुनाथ मिश्र की पुरानी चुनिन्दा गज़लेँ.
              000
           गज़ल (1)
सोच ले तू किधर जा रहा है:
        000
सोच ले तू किधर ज रहा है.
एक अज़ूबी ड्गर जा रहा है.
किसका जादू हुआ है युँ हावी,
तुझको मीठा ज़हर भा रहा है.
होता फौलाद है आदमी फिर,
रेत सा क्योँ बिखर जा रहा है.
तोड सक्ता है पत्थर जो सिर से,
हाँफता क्योँ नज़र आ रहा है.
नफरतोँ के ज़हर घोल दिल मेँ,
प्रेम पर क्योँ क़हर ढा रहा है.
ज़िंस की भांति बिकने की धुन मेँ,
तुझमेँ  कैसा न असर अ रहा है.
बस बना झुंझुना दूसरोँ का.
बेवज़ह जी के मर जा रहा है.
        000
  - डा. रघुनाथ मिश्र

             गज़ल (2)
             मंज़र है
              000
प्रतिबन्धित आंसू और ज़ुल्म-ओ-सितम भरा मंज़र है.
मौत और हत्या मेँ, कर पाना मुश्किल अंतर है.
तर्क सटीक, बात सीधी, सब ठीक-ठाक होने पर भी,
खुले  ज़ुबाँ,  उससे पहले  ही, सीने  मेँ  खंज़र  है.
तेल दियोँ मेँ मिल जायेगा, यह विधिवत घोशित है,
रोज़-रोज़ लम्बी  क़तार, आता  न कभे  नम्बर है.

तर्क सही और लोग सही, फिर क्युँ छूट गये मुल्ज़िम.
प्रश्न किया उस दिग्गज़ से क्योँ, माई- बाप वही गुरुवर है.
अस्तित्वोँ पर हर पल, वह् क़ाबिज़्, अचरज फिर कैसा,
जारी रहना है सब युँ ही, जब तक आग दबी अन्दर है.
दन्द-फन्द, दकियानूसी, अफवाहेँ फलीँ- फलेँगी युँ ही,
जब तक चढी भेडियोँ पर, ये खाल धवल  खद्दर  है.
              000
 - डा. रघुनाथ मिश्र

           गज़ल (3)
           क्या करेँ.
            000
सितम   उनकी  आदत  है, क्या  करेँ.
अज़ीब ये नज़ाकत है, क्या करेँ क्या करेँ.
वे   महफूज़  हैँ   फिर, आग  लगा कर,
उन्हेँ   ये   रियायत  है, क्या      करेँ.
आदत है अपनी आज कल. तूफाँ से उलझना,
इसमेँ    ही   हिफाज़त     है, क्या   करेँ.

लागू  करायी  जाय, भेडियोँ    की सभ्यता,
ये    खास   हिदायत   है    क्या   करेँ.

बेफौफ  ज़ुल्म, साज़िशेँ, दहशतज़दा  माहौल,
ये    रंग -ए- सियासत  है,  क्या    करेँ.
             000
        डा. रघुनाथ मिश्र

            गज़ल (4)
           हम तलाशेंगे
             000
कितने  हो गये तबाह,  हम  तलाशेँगे
चश्मदीद   कुछ  गवाह,   हम  तलाशेँगे.
ठिठुर रहे होँ सर्द  रात मेँ, असंख्य  जहाँ,
वहीँ   पे  गर्म   ऐशगाह, हम   तलाशेंगे.

यहाँ ये  रोज़  भूख - प्यास - महामारी है,
वहाँ पे क्योँ  है वाह -वाह्,  हम  तलाशेंगे.
खुलूस-ओ-प्यार की, आब-ओ-हवा ज़हरने मेँ
उठी  है  कैसे यह  अफवाह, हम  तलाशेंगे.
जिन  बस्तियोँ  मेँ,  हर खुशी,  बाँटी  उनमेँ,
ठहरी    है  क्योँ   कराह, . हम   तलाशेँगे. 

बहते   हुए  दरिया  का,  अचानक  युँ   ही,
ठहरा   है   क्योँ   प्रवाह,   हम   तलाशेँगे.
                 000
   -डा. रघुनाथ मिश्र
             गज़ल् (5)
      खुशी की तलाश जारी है
             000
खुशी की तलाश जारी  है.
हँसी  का  प्रयास जारी है.

जिस  घर ने अँधेरा बोया,
उसी  मेँ  उजास  जारी है.

कुछ को अजीर्ण है लेकिन,
शहर  मेँ  उपवास जारी है.

लोग   सी  देँगे जुबाँ लेकिन,

बोलने का  अभ्यास  जारी है.

टूट जाना था जिसे पहले,
वह क्रम अनायास जारी है

कितने हैँ वतन के सौदागर,
ऐसा  एक  कयास जारी है.
मिटाये नाम जो बदनाम कहकर्,
उसी  का  इतिहास  जारी   है.
आज़ादी  के  तमाम  वर्शोँ  मेँ.
आज़ादी  की  प्यास  जारी  है.
       - डा. रघुनाथ मिश्र
( मेरी पुस्तक, 'सोच ले तू किधर जा रहा है' हिन्दी, उर्दू गज़ल संग्रह से)